Posts

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी को शत शत नमन

Image
 राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त  राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त, 1886 को झाँसी में हुआ। गुप्तजी खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि हैं। गुप्त जी कबीर दास के भक्त थे। पं महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रेरणा से इन्होंने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया।  मैथिलीशरण गुप्त को साहित्य जगत में 'दद्दा' नाम से सम्बोधित किया जाता था। 'भारत-भारती', मैथिलीशरण गुप्तजी द्वारा स्वदेश प्रेम को दर्शाते हुए वर्तमान और भावी दुर्दशा से उबरने के लिए समाधान खोजने का एक सफल प्रयोग कहा जा सकता है। भारत दर्शन की काव्यात्मक प्रस्तुति 'भारत-भारती' निश्चित रूप से किसी शोध से कम नहीं आंकी जा सकती। मैथिलीशरण गुप्त यद्यपि बालसाहित्य की मुख्यधारा में सम्मिलित नही फिर भी उन्होंने कई बाल-कविताओं से हिन्दी बाल-काव्य को समृद्ध किया है। उनकी 'माँ, कह एक कहानी' कविता के अतिरिक्त 'सर्कस' व 'ओला' बाल-कविताएँ अत्यंत लोकप्रिय रचनाएं हैं। मुख्य कृतियाँ : पंचवटी, साकेत, जयद्रथ वध, यशोधरा, द्वापर, झंकार, जयभारत महाकाव्य- साकेत खंड काव्य- जयद्रथ वध, भारत-भ...

अश्रु बन भावनाएँ- सपना

Image
  नवगीत  अश्रु बन भावनाएँ टूटे शब्द करे दावा उर पीड़ा बाहर फूटे बहती बन लावा । शब्द कैसे हों खामोश ह्रदय अनुभूतियाँ भर कर शताब्दियों के प्रवाह से जीवन धारा से लड़कर  अस्थियाँ भी देह से छूटे संसार छलावा  उर पीड़ा बाहर फूटे बहती बन लावा । खुशियों का मेला लगता उसे हम कभी कह न सके दुख की बस सौगात मिली  उसे हम यहाँ सह न सके समय यहाँ हाथ से छूटे क्यों अब पछतावा  उर पीड़ा बाहर फूटे बहती बन लावा । शब्द पत्थर पर बह घिसे देखो लहू गीत गाते हैं  याद रहा निर्मोही पल होंठ सिल जहाँ जातें हैं  सत्य यही बाकी सब झूठे क्यों यहाँ दिखावा  उर पीड़ा बाहर फूटे बहती बन लावा । क्षितिज भी शून्य देख रहा अंबर तिमिर वरण सा है संसार का ऐसा कोना अब तक नहीं किरण सा है मरीचिका बन "सपना" टूटे रिश्तों का धावा  उर की पीड़ा बाहर फूटे बहती बन लावा । अनिता मंदिलवार "सपना"