अश्रु बन भावनाएँ- सपना


 



नवगीत 


अश्रु बन भावनाएँ टूटे

शब्द करे दावा

उर पीड़ा बाहर फूटे

बहती बन लावा ।


शब्द कैसे हों खामोश

ह्रदय अनुभूतियाँ भर कर

शताब्दियों के प्रवाह से

जीवन धारा से लड़कर 


अस्थियाँ भी देह से छूटे

संसार छलावा 

उर पीड़ा बाहर फूटे

बहती बन लावा ।


खुशियों का मेला लगता

उसे हम कभी कह न सके

दुख की बस सौगात मिली 

उसे हम यहाँ सह न सके


समय यहाँ हाथ से छूटे

क्यों अब पछतावा 

उर पीड़ा बाहर फूटे

बहती बन लावा ।


शब्द पत्थर पर बह घिसे

देखो लहू गीत गाते हैं 

याद रहा निर्मोही पल

होंठ सिल जहाँ जातें हैं 


सत्य यही बाकी सब झूठे

क्यों यहाँ दिखावा 

उर पीड़ा बाहर फूटे

बहती बन लावा ।


क्षितिज भी शून्य देख रहा

अंबर तिमिर वरण सा है

संसार का ऐसा कोना

अब तक नहीं किरण सा है


मरीचिका बन "सपना" टूटे

रिश्तों का धावा 

उर की पीड़ा बाहर फूटे

बहती बन लावा ।


अनिता मंदिलवार "सपना" 


Comments

  1. मरीचिका बन "सपना" टूटे

    रिश्तों का धावा

    उर की पीड़ा बाहर फूटे

    बहती बन लावा ।


    बहुत सुंदर रचना,

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